मासिक किस्त कहाँ से निकलती है
समान किस्त वाली चुकौती में मूलधन और ब्याज का अनुपात बदलता रहता है ताकि हर महीने की कुल रकम एक जैसी बनी रहे। किस्त निकालने के लिए मूलधन को (r(1+r)^n) ÷ ((1+r)^n − 1) से गुणा किया जाता है, जहाँ r सालाना दर को बारह से भाग देकर मिलता है और n महीनों की संख्या है।
शुरू में शेष बड़ा होता है, इसलिए हर किस्त का बड़ा हिस्सा ब्याज होता है। 2.7 करोड़ रुपये को 3.5% पर तीस साल के लिए लेने पर पहली किस्त 1,21,230 रुपये में से 78,750 ब्याज और सिर्फ 42,480 मूलधन होता है। शेष घटने के साथ यह अनुपात उलट जाता है।
समान मूलधन वाली चुकौती में मूलधन का हिस्सा तय रहता है और ब्याज सिर्फ बचे हुए शेष पर लगता है, इसलिए किस्तें ऊँची शुरू होकर घटती जाती हैं। एकमुश्त चुकौती में पूरी अवधि सिर्फ ब्याज भरा जाता है और अंत में पूरा मूलधन एक बार में लौटाया जाता है।
उधार लेने वाले से जो छूट जाता है
सालाना दर को सालों की संख्या से गुणा कर देना ब्याज को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर दिखाता है। उससे लगता है कि 2.7 करोड़ रुपये के ऋण पर 3.5% की दर से तीस साल में 2.84 करोड़ ब्याज लगेगा, जबकि असली आँकड़ा लगभग 1.67 करोड़ है, क्योंकि शेष पूरे समय घटता रहता है।
आधा प्रतिशत अंक छोटा लगता है पर है नहीं। तीस करोड़ के तीस साल के ऋण में 3.5% और 4.0% के बीच कुल ब्याज का फर्क लगभग तीन करोड़ है — महीने में करीब अस्सी हजार, जो तीन सौ साठ बार दोहराया जाता है।
पूर्व-भुगतान शुल्क छोड़कर पुनर्वित्त के विकल्प तौलने पर जवाब गलत आता है। कई अनुबंध बचे हुए मूलधन का 0.5 से 1.4% लेते हैं, और उसे बचने वाले ब्याज के सामने रखकर देखना जरूरी है।
अवधि तय करने से पहले
मोहलत अवधि तात्कालिक किस्त घटाती है पर कुल ब्याज बढ़ा देती है, क्योंकि उस दौरान मूलधन बिल्कुल नहीं घटता। आय शुरू होने से पहले का अंतराल पाटने के अलावा यह शायद ही फायदेमंद होती है।
अवधि बढ़ाने से मासिक किस्त घटती है और कुल लागत तेजी से चढ़ती है। 2.7 करोड़ रुपये को 4.5% पर लेने पर बीस साल में करीब 1.4 करोड़ ब्याज लगता है और तीस साल में करीब 2.22 करोड़। जितना संभाल सकें उतनी अवधि घटाना बचत का सबसे भरोसेमंद तरीका है।